खुद पर भरोसा करने का हुनर सीख लो.....


दरवाज़ों पे खाली तख्तियां अच्छी नहीं,

मुझे उजड़ी हुई ये बस्तियां अच्छी नहीं लगती।

चलती तो समंदर का भी सीना चीर सकती थीं,

यूं साहिल पे ठहरी कश्तियां अच्छी नहीं लगती।

ताल्लुक बोझ लगता है तो कह दी दुनिया से,

तेरे लहजे में लेकिन तल्खियां अच्छी नहीं लगती।

खुदा भी याद आता है ज़रूरत पे यहां सबको,

दुनिया की यही खुदगर्जियां अच्छी नहीं लगती।

उन्हें कैसे मिलेगी माँ के पैरों के तले जन्नत,

जिन्हें अपने घरों में बच्चियां अच्छी नहीं लगती।



हाथ की लकीरों में अगर आप भी अपनी किस्मत तलाश करते हैं,

तो थोड़ा रुक जाइए क्योंकि हाथ की लकीरों के आगे उंगलियां दी हुई है,

और वही उंगलियां हैं जो हमारी किस्मत लिख भी सकती हैं और मिटा भी सकती हैं।

जरूरी नहीं कि हर सबक किताबों से ही सीखी जाए,

कुछ सबक रिश्ते और इंसान भी सिखा जाते हैं,

मेरे पास वक्त नहीं है उन लोगों से नफरत करने का,

जो मुझसे नफरत करते हैं क्योंकि,

मैं व्यस्त हूँ उन लोगों में जो मुझसे प्यार करते हैं।



क्या सुनाऊं अपनी जिंदगी की दास्तां,

मानता हूं अपने खुदा की दुआ हूं मैं।

कहूं क्या सदमा तो है मुझे भी बहुत कि,

तुझसे इतने दिनों से ना जाने क्यों जुदा हूं मैं।

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