एक ऐसे बाबा जो न कुछ खाते न पीते , जाने पूरी सच्चाई

जैसा की हम सभी जानते है की हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ऋषि मुनियों की कई वर्षो तक जंगलो, पहाड़ों तथा कंदराओं में कठिन तपस्या करते है. बहुत से लोग इसे काल्पनिक कहानियाँ ही मानते है किन्तु छतीसगढ़ के निवासी नही. छत्तीसगढ़ राज्य के रायगढ़ जिला मुख्यालय में फरवरी 16, 1998 से तपस्या में लीन हुए बाबा सत्यनारायण को इस हठ योग को करते हुए कुल 21 वर्ष बीत चुके हैं.

आपको बता दे कि कोसमनारा से 19 किलोमीटर की दूरी पर देवरी, डूमरपाली नामक स्थान में एक किसान दयानिधि साहू तथा हँसमती साहू के घर में 12 जुलाई 1984 को जन्मे बाबाजी अपने बचपन से ही आध्यात्मिक स्वभाव के बालक थे. एक बार की बात है वे अपने गांव में तालाब के किनारे स्थित शिव मंदिर में लगातार पूरे 7 दिनों तक तपस्या करते रहे. तब मॉ-बाप तथा गांव वालों के द्वारा समझाइश देने पर वे घर लौटे तो जरूर किन्तु एक प्रकार से स्वयं शिव उनके अन्दर विराज चुके थे.बाबा किस समय क्या खाते हैं कब समाधि से उठते हैं किसी को आजतक पता नहीं चल सका. भोजन करते भी किसी के द्वारा नहीं देखा गया. इनका जीवन किसी काल्पनिक कहानी जैसा लगता है.

बाबाजी 14 की उम्र में एक दिन वे स्कूल जाने हेतु बस्ता लेकर के लिए निकले, किन्तु स्कूल नही जा प[ए . बाबाजी अपनी स्कूल यूनिफार्म सफेद शर्ट तथा खाकी हाफ पैंट में ही रायगढ़ की तरफ चल पड़े. वे अपने गांव से काफी दूर तथा रायगढ़ से कालर स्थित कोसमनारा(रायगढ़) पैदल ही जा पहुचे.

बाबा ने एक बंजर जमीन पर पत्थरो को इकट्ठा करके शिवलिंग का स्वरूप दिया तथा अपनी जीभ काट कर शिव जी को समर्पित कर दिया. कुछ दिनों तक तो किसी को भी इस बात का पता न चला किन्तु फिर जंगल मे अग्नि की भाँती खबर फैलती चली गई एवं लोगो का जमघट वहां पहुचने लगा.कुछ लोगो के द्वारा बालक बाबा की निगरानी भी कराई गई किन्तु बाबा जी शिव की तपस्या में एक बार जो लीन हुए तो आज तक अपने उस स्थान में हठ योग में लीन हैं. माता-पिता के द्वारा बचपन मे नाम दिया गया था हलधर. पिता उन्हें प्यार से सत्यम नाम से बुलाते थे. उनके हठयोग को देखकर लोगों ने ही उनको बाबा सत्य नारायण नाम दिया. रायगढ़ की इस धरती को तीर्थ स्थल बनाने वाले बाबा सत्यनारायण के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के लिए अब कोसमनारा में लगभग हर मुमकिन व्यवस्था उपलब्ध है.

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